शनिवार, 8 जून 2024

एकाकीपन की शांत शक्ति

हम सभी जानते हैं कि इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। दृश्य जगत की सभी वस्तुएं और संबंध केवल संयोग हैं - अस्थायी मिलन। वास्तव में, हर जीव अंततः अपने सुख-दुख को अकेले ही भोगता है। फिर भी हम लगातार बाहरी संबंधों और वस्तुओं से आसक्त रहते हैं।

सच्चाई यह है कि अकेलेपन की भी दो स्थितियां होती हैं। एक वह जिसमें हम रिक्तता और पीड़ा का अनुभव करते हैं। और दूसरी वह जिसमें हम पूर्णता और शांति का अनुभव करते हैं। दरअसल, वास्तविक एकाकीपन वही है जिसमें हम अपने आप में संतुष्ट और परिपूर्ण होते हैं।

जब हम बाहरी संबंधों और वस्तुओं से मुक्त होकर केवल अपने आत्म-तत्व से जुड़ते हैं, तभी हम इस शांत एकाकीपन को महसूस कर पाते हैं। यह एक अत्यंत शांत और समावेशी स्थिति होती है जहां हम अहंकार से मुक्त होकर जीवन के प्रवाह के साथ बहते रहते हैं। 

इस स्थिति में व्यक्ति पूरी तरह स्वावलम्बी होता है। उसे किसी और व्यक्ति या बाहरी चीज की आवश्यकता नहीं रहती। वह समता भाव से अपना जीवन बिताता है और हर स्थिति को आत्मसात करता है। न उसे सुख में अहंकार होता है और न ही दुख में पीड़ा।

आज के भागदौड़ भरे जीवन में ऐसा एकाकीपन शायद अप्राप्य लग सकता है। लेकिन यही वह शक्ति है जो हमें शांति और संतुलन प्रदान करती है। जब तक हम बाहरी संबंधों और वस्तुओं पर निर्भर रहेंगे, हम कभी भी वास्तविक खुशी नहीं पा सकेंगे। सच्ची सुख-शांति तो अपने भीतर ही छिपी है।

इसलिए आइए, हम इस एकाकीपन को आत्मसात करें और अपने भीतर की शक्ति को पहचानें। बस इतना ही करना है - बाहर की चकाचौंध से मुक्त होकर अपनी आत्मा से जुड़ जाना। बाकी सब तो संयोग है, जीवन का प्रवाह है। उसके आगे झुकना सीखिए और आप अनंत शांति का अनुभव करेंगे। यही वास्तविक एकाकीपन है।

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