संदेश

सुभाषित

वाणी रसवती  यस्य यस्य श्रमवती क्रिया ।
लक्ष्मीर्दानवती यस्य सफलं तस्य जीवितम् ॥भावार्थ- जिसकी वाणी रसपूर्ण हो, कर्म-क्रिया श्रमवान हो, और लक्ष्मी दानवती हो उसका जीवन निश्चित ही सफल होता है।शान्तितुल्यं तपो नास्ति
           न संतोषात्परं सुखम्।
न तृष्णया: परो व्याधिर्न
           च धर्मो दया परा:।।भावार्थ- शान्ति के समान कोई तप नही है, संतोष से श्रेष्ठ कोई सुख नही, तृष्णा से बढकर कोई रोग नही और दया से बढकर कोई धर्म नहीं।


Beautiful interpretation of Karma and Bhagya

✍एक चाट वाला था। जब भी चाट खाने जाओ ऐसा लगता कि वह हमारा ही रास्ता देख रहा हो। हर विषय पर बात करने में उसे बड़ा मज़ा आता। कई बार उसे कहा कि भाई देर हो जाती है जल्दी चाट लगा दिया करो पर उसकी बात ख़त्म ही नहीं होती।एक दिन अचानक कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई।तक़दीर और तदबीर की बात सुन मैंने सोचा कि चलो आज उसकी फ़िलासफ़ी देख ही लेते हैं। मैंने एक सवाल उछाल दिया।मेरा सवाल था कि आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से?और उसके जवाब से मेरे दिमाग़ के सारे जाले ही साफ़ हो गए।कहने लगा,आपका किसी बैंक में लॉकर तो होगा?उसकी चाभियाँ ही इस सवाल का जवाब है। हर लॉकर की दो चाभियाँ होती हैं।एक आप के पास होती है और एक मैनेजर के पास।आप के पास जो चाभी है वह है परिश्रम और मैनेजर के पास वाली भाग्य।जब तक दोनों नहीं लगतीं ताला नहीं खुल सकता।आप कर्मयोगी पुरुष हैं और मैनेजर भगवान।अाप को अपनी चाभी भी लगाते रहना चाहिये।पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाभी लगा दे। कहीं ऐसा न हो कि भगवान अपनी भाग्यवाली चाभी लगा रहा हो और हम परिश्रम वाली चाभी न लगा पायें और ताला खुलने से रह जाये ।
This is a beautiful interpretation of Karm…

मित्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाऐ

तप्त ह्दय सरस स्नेह से
जो सहला दे मित्र वही है
रूखे मन को सरोबार कर
जो नहला दे मित्र वही है
प्रिय वियोग संतप्त चित्त को
जो बहला दे मित्र वही है
अश्रु बूंद की एक झलक से
जो दहला दे मित्र वही है
मित्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाऐ