सोमवार, 21 नवंबर 2022

The wealth of knowledge Is the most superior wealth of all!

न चोरहार्य न राजहार्य न भ्रतृभाज्यं न च भारकारि।

व्यये कृते वर्धति एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।।

It cannot be stolen by thieves, Nor can it be taken away by kings. It cannot be divided among brothers,

It does not cause a load on your shoulders.

If spent, It indeed always keeps growing. The wealth of knowledge Is the most superior wealth of all!

It is impossible for crooks to steal it, and even rulers are powerless to take it away. It is not something that can be split up among siblings, and it is not something that places a burden on your shoulders. If it is spent, it does certainly always continue to increase. The richness that comes from having a lot of information is the best kind of wealth. The wealth of knowledge Is the most superior wealth of all!

It is impregnable by both common thieves and absolute monarchs. You can't split it with your bros, and it won't weigh you down. If you spend it, it will continue to increase in value forever. Knowledge is the ultimate source of prosperity.

रविवार, 20 नवंबर 2022

Character and Intellect

 Character and Intellect

चरित्र उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि बुद्धिमत्ता

Character and intelligence are the two poles of our capacity; achieving satisfaction with one without the other is only halfway possible. Character is just as important as intelligence in this situation. On the other hand, it is the misfortune of a fool to fail in his attempts to achieve the position, employment, neighborhood, and group of acquaintances that are a good fit for him.

We can only be happy to a significant degree if we make use of both our intellectual and moral faculties. Character is also required in addition to intelligence. In contrast, the folly of the fool is that he cannot find the place, the job, the community, or the friends that are best for him.
The two ends of our potential—our character and our intelligence—are inseparable, and it's impossible to be fully satisfied with either one without the other. Being of good character is equally as crucial as brains right now. A fool, on the other hand, is doomed to misery if he is unable to find success in the realms of politics, economics, socialization, and personal relationships. If we want to experience considerable levels of happiness, it is imperative that we make use of both our intellectual and moral capacities. In addition to intelligence, character is also a necessary component. The idiocy of the idiot, on the other hand, lies in the fact that he is unable to locate the location, the work, the community, or the people that are most suitable for him.
Our character and our intelligence are the two extremes of our potential, and it is impossible to be totally satisfied with either one of them without the other. However, it is possible to be fully satisfied with just one of them. Right now, having strong morals is just as important as having a solid head for business. If, on the other hand, a person is unable to achieve success in the areas of politics, economy, socialization, and personal relationships, then that person is destined to spend their life in unhappiness.

चरित्र और बुद्धि हमारी क्षमता के दो ध्रुव हैं; एक के बिना दूसरे के साथ संतुष्टि प्राप्त करना केवल आधा संभव है। इस स्थिति में चरित्र उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि बुद्धिमत्ता। दूसरी ओर, यह एक मूर्ख का दुर्भाग्य है कि वह उस स्थिति, रोजगार, पड़ोस और परिचितों के समूह को प्राप्त करने के अपने प्रयासों में विफल हो जाता है जो उसके लिए उपयुक्त हैं।

हम काफी हद तक खुश तभी रह सकते हैं जब हम अपनी बौद्धिक और नैतिक दोनों क्षमताओं का इस्तेमाल करें। बुद्धि के साथ-साथ चरित्र की भी आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, मूर्ख की मूर्खता यह है कि उसे वह स्थान, नौकरी, समुदाय या मित्र नहीं मिल सकते जो उसके लिए सबसे अच्छे हों।

हमारी क्षमता के दो छोर - हमारा चरित्र और हमारी बुद्धि - अविभाज्य हैं, और एक के बिना दूसरे से पूरी तरह संतुष्ट होना असंभव है। अच्छे चरित्र (मजबूत नैतिकता) का होना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि अभी दिमाग। । यदि हम खुशी के काफी स्तरों का अनुभव करना चाहते हैं, तो यह जरूरी है कि हम अपनी बौद्धिक और नैतिक दोनों क्षमताओं का उपयोग करें। बुद्धि के अतिरिक्त चरित्र भी एक आवश्यक घटक है। हमारा चरित्र और हमारी बुद्धि हमारी क्षमता के दो चरम हैं, और उनमें से किसी एक से दूसरे के बिना पूरी तरह से संतुष्ट होना असंभव है। 

दूसरी ओर, बेवकूफ की मूर्खता इस तथ्य में निहित है कि वह अपने लिए सबसे उपयुक्त स्थान, कार्य, समुदाय या लोगों का पता लगाने में असमर्थ है।  दूसरी ओर, एक मूर्ख, राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजीकरण और व्यक्तिगत संबंधों के क्षेत्र में सफलता पाने में असमर्थ होने पर दुख के लिए बर्बाद होता है| यदि कोई व्यक्ति राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाजीकरण और व्यक्तिगत संबंधों के क्षेत्रों में सफलता प्राप्त नहीं कर पाता है, तो उस व्यक्ति का जीवन दुख में व्यतीत होना तय है।

The Art of Worldly Wisdom, by Balthasar Gracian, tr. by Joseph Jacobs, [1892]

शनिवार, 19 नवंबर 2022

घमंड विनाश का कारण

Man is considered to be the most precious creation in God's creation, but Man becomes so arrogant in the affair of me and mine. Pride leads to destruction. When arrogance (pride) speaks headlong, foolishness begins to dominate, and actions done in that condition lead to destruction. The ego is the main cause of destruction. Pride is the biggest enemy of man. Money, wealth, fame, glory, fame, power should not be proud of anything in a man and if it is so, then at one time all these elements leave together. Ego leads us to downfall.

Pride destroys a man and leaves him. He takes away the conscience of man. corrupts his intelligence. Pride means a person suffering from ego does not consider anyone in front of him as anything and he considers himself to be all-all and the best. He gets the idea that he is the best, there is no one like him, he can do everything. Pride is the cause of destruction. Ravana was destroyed due to pride.

भगवान की बनाई गई सृष्टि में इसान सबसे अनमोल कृति माना जाता है, लेकिन इसान मैं और मेरा के चक्कर में इतना घमंडी हो जाता है।  घमंड विनाश का कारण बनता है. जब अहंकार (घमंड) सिर चढ़कर बोलता है, तो मूर्खता हावी होने लगती है और उस दशा में किये गए कर्म विनाश की ओर ले जाते हैंविनाश का प्रमुख कारण अहंकार ही हैं।  घमंड मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है धन, संपदा, यश, वैभव, कीर्ति, ताकत किसी भी चीज का घमंड मनुष्य में नहीं होना चाहिए और यदि ऐसा है तो एक समय यह सभी तत्व साथ छोड़ देते हैं। अहंकार हमें पतन की ओर ले जाता है।

घमंड मनुष्य का सर्वनाश करके छोड़ता है। वह मनुष्य के विवेक को हर लेता है। उसकी बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है। घमंड अर्थात अहंकार से ग्रस्त व्यक्ति अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता और वो खुद को ही सर्वे-सर्वा और सर्वश्रेष्ठ समझता है। उसके मन में यह धारणा घर कर जाती है कि वही सर्वश्रेष्ठ है, उसके जैसा कोई नही, वो सब कुछ कर सकता है। घमंड विनाश का कारण होता है।  घमंड के कारण रावण का विनाश हुआ | 

 मत इतरा अपने गुरूर के मकान पर ये बनता नहीं अगर एक मजदूर न होता।

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र


अयि गिरिनन्दिनि का अर्थ है पर्वत की पुत्रि |

आदिशक्ति माँ दुर्गा को अयि गिरिनन्दिनि कहा जाता है|  हिमालयराज की कन्या | माँ दुर्गा को महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने महिषासुर राक्षस का वध किया था | 

पुराणों में उल्लेखित के अनुसार केवल मानव ही नहीं देवता भी असुरों के अत्याचार से परेशान हो गए थे। तब सभी देवगण ब्रह्माजी के पास गए और उनसे सामाधान मांगा। तब ब्रह्मा जी ने बताया कि दैत्यराज का वध एक कुंवारी कन्या के हाथ ही हो सकता है।इसके बाद सभी देवताओं ने मिलकर अपने तेज को एक जगह समाहित किया और इस शक्ति से देवी का जन्म हुआ। देवी के शरीर का अंग प्रत्येक देव की शक्ति के अंश से उत्पन हुआ था।देवी का जन्म तो हो गया, लेकिन महिषासुर के अंत के लिए देवी को अभी भी अपार शक्ति की जरूरत थी। तब भगवान शिव ने उनको अपना त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र, हनुमान जी ने गदा, श्रीराम ने धनुष, अग्नि ने शक्ति व बाणों से भरे तरकश, वरुण ने दिव्य शंख, प्रजापति ने स्फटिक मणियों की माला, लक्ष्मीजी ने कमल का फूल, इंद्र ने वज्र, शेषनाग ने मणियों से सुशोभित नाग, वरुण देव ने पाश व तीर, ब्रह्माजी ने चारों वेद तथा हिमालय पर्वत ने माता उनका वाहन सिंह दिया। इन सभी अस्त्र-शस्त्र को देवी दुर्गा ने अपनी 18 भुजाओं में धारण किया।अस्त्र-शस्त्र और आंतरिक शक्ति से देवी का विराट रूप बन गया और असुर उन्हें देख कर ही भयभीत होने लगे। देवी के पास सभी देवताओं की शक्तियां हैं। उनके जैसा कोई दूसरा शक्तिशाली नहीं है, उनमें अपार शक्ति है, उन शक्तियों का कोई अंत नहीं है, इसलिए वे आदिशक्ति कहलाती हैं।

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम जगद्गुरु आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) द्वारा रचित है |

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