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गुरुवार, 24 सितंबर 2015

नजरिया

एक छोटा सा बच्चा अपने दोनों हाथों में एक एक एप्पल लेकर खड़ा था
उसके पापा ने मुस्कराते हुए कहा कि
"बेटा एक एप्पल मुझे दे दो"
इतना सुनते ही उस बच्चे ने एक एप्पल को दांतो से कुतर लिया.
उसके पापा कुछ बोल पाते उसके पहले ही उसने अपने दूसरे एप्पल को भी दांतों से कुतर लिया
अपने छोटे से बेटे की इस हरकत को देखकर बाप ठगा सा रह गया और उसके चेहरे पर मुस्कान गायब हो गई थी...
तभी उसके बेटे ने अपने नन्हे हाथ आगे की ओर बढाते हुए पापा को कहा....
"पापा ये लो.. ये वाला ज्यादा मीठा है."
!!!!!!!!!
शायद हम कभी कभी पूरी बात जाने बिना निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं।
नजर का आपरेशन तो सम्भव है, पर नजरिये का नही..!!!

सोमवार, 3 अगस्त 2015

साहस

श्रावस्ती क्षेत्र में उस वर्ष भयानक दुर्भिक्ष पड़ा। अन्न के अभाव से असंख्यों को प्राण त्यागना पड़ा। आजीविका की खोज में अगणित लोग देश त्यागकर अन्यत्र चले गये।
प्रश्न उन माताओं का था जिनके बच्चे छोटे थे और घर के पुरुष या तो मर गये थे या अन्यत्र जा चुके थे। वे दयनीय स्थिति में मरण मुख में जा रही थीं।
बुद्ध से यह करुण दृश्य देखा न गया। उस क्षेत्र के साधन सम्पन्नों की उनने गोष्ठी बुलाई और इस अनाथ समुदाय की प्राण रक्षा का उपाय करने के लिए अनुरोध किया।
श्रीमन्तों के पास साधन तो थे पर थे इतने ही कि अपने परिवार का एक वर्ष तक निर्वाह कर सकें। उनमें से किसी ने भी व्यवस्था जुटाने की पहल करने का साहस न दिखाया। सभी सिर झुकाये बैठे थे।
स्तब्धता को चीरते हुए एक बारह वर्ष की कन्या उठी। उसने कहा- देव, आज्ञा दें तो मैं इस समुदाय के निर्वाह का उत्तरदायित्व उठाऊँ।
तथागत ने चकित होकर पूछा- वत्स तुम कौन हो? और किस प्रकार यह व्यवस्था कर सकोगी?
बालिका ने कहा- देव! मनुष्य कितना ही निष्ठुर क्यों न हो, उसके अन्तराल में कहीं न कहीं करुणा अवश्य छिपी रहती है। मैं उसी को जिनके घर चूल्हा जलेगा उन्हीं से आधी रोटी उन मरणासन्नों की स्थिति का परिचय कराकर ममता जगाऊँगी। आधी रोटी लेकर रहूँगी।
बुद्ध ने उसके शिर पर हाथ फिराया और कहा श्रीमन्तों से अधिक जन-भावना की सम्पन्नता अधिक है तुम उसे उभारने में सफल हो, ऐसा आशीर्वाद दिया।
सुचेता का वह व्रत एक वर्ष तक चला। वर्षा रहित दुर्भिक्ष दूर होने तक की इस अवधि में सुचेता ने एक सहस्र अनाश्रितों को नित्य भोजन कराने में श्रेय मात्र अपने पुरुषार्थ बल पर अर्जित किया।

शनिवार, 1 अगस्त 2015

शक्ति से बुद्धि ज्यादा बलवान होती है

एक पीपल के वृक्ष पर कौआ और उसकी पत्नि रहते थे । दोनों पति पत्नि में बहुत प्यार था ,दोनों कभी एक पल के लिए भी एक दुसरे से अलग नही होते थे । सुबह होते ही दोनों खाने की तलाश में निकल जाते और शाम होने पर घर लौटते ।बहुत ही आनन्द पूर्वक दोनों अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे ।किन्तु उन्हें एस बात का दुख था कि उनके घर कोई संतान नही थी ।कुछ समय बाद एक दिन उसकी पत्नि गर्भवती हो गई, यह सुनकर कौआ खुशी से झुमने लगा, कुछ ही समय में उनके घर दो प्यारे बच्चे आ गए, दोनों खुशी के मारे नाचने लगे, और आनन्द के साथ अपने बच्चो का पालन-पोषण करने लगे, एक दिन भोजन का प्रबंध कर जब शाम को घर लौटें तो उनके होश उड़ गए, क्योंकि दोनों बच्चे गायब थे, तब दोनों ने अपने आस-पास खुब ढुँढा, और फिर थक हार कर बैठ गए, उसी पेड़ पर एक बहुत बड़ा जहरीला साँप रहता था, कौआ समझ गया, कि बच्चों को इसी साँप ने खाया है , वह उसको अपना शत्रु समझ्ने लगा । कुछ समय के पश्चात उसकी पत्नि फिर से गर्भवती हुई ,उसने अंडे दिए,कौआ बोला- प्रिये, तुम इनकी रक्षा करो, मै अकेले ही भोजन का प्रबंध करके आता हुँ ।पत्नि वही रहकर अपने अंडों की रक्षा करने लगी, तब एक दिन पत्नि बोली – एक-दो दिन में बच्चे बाहर आने वाले है , अब साँप से इनकी रक्षा कैसे करेगें, कौआ बोला- वह बहुत बड़ा और शक्तिशाली साँप है, मैं इतना ताकतवर नही हुँ, कि उसका सामना कर सकुँ, किन्तु मुझें शक्ति से नही बल्कि अपनी बुद्धी से उसे हराना है ,वह अपनी पत्नि से बोला-
पास के सरोवर में एक राजकुमार नहाने के लिय आता है, वह नहाने से पहले अपने सारे गहने उतार देता है, उसमें मोतियों का एक हार भी है, मै वह हार लेकर आऊँगा , फिर तुम देखना मैं क्या करता हुँ। कौआ सुबह उठकर सरोवर के पास गया, वहाँ राजकुमार अपने सारे गहने उतारकर नहाने के लिए तालाब में गया, तब कौआ मोती का हार अपनी चोंच में दबाकर उड़ने लगा, यह देखकर सिपाही उसके पीछे भागने लगे, तब कौआ ने वह हार ले जाकर साँप के बिल के बाहर रख दिया, साँप ने बाहर निकलकर जब उस हार को देखा ,तो वह तुरन्त हार लेकर बिल में घुस गया। राजा के सिपाही ने सब देख लिया ,वह बिल के पास पहुँच कर बिल को खोदने लगे, साँप को लाठी से पीट कर मार डाला और हार ले आए,
इस प्रकार कौए ने बड़ी चतुराई के साथ अपनी बुद्धी से शत्रु को मरवा दिया, और वह अपने बच्चों और पत्नि के साथ बड़े आनन्दपूर्वक खुशी खुशी रहने लगा ।इसीलिए कहते है कि शक्ति से बुद्धि ज्यादा बलवान होती है, बुद्धि के बल से बड़े-बड़े शक्तिशाली को भी परास्त किया जा सकता है ।

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